Speeches

November 5, 2017

Speaking at Meeting with Intellectuals, in Shimla (Himachal Pradesh)

इसको हम चेक कर लेंगे और मेडिकल एडवाइस भी ले लेंगे इसमें कि इस परिस्थिति में क्या होता है| अगर ऐसा है तो obviously we have to correct it. प्रधानमंत्री जी ने कई बार कहा है और आप लोगों ने भी सुना होगा और आप याद करिए तीन-साढ़े तीन साल अब हमें हो गए हैं, जो भी फीडबैक मिलता है, जो भी सुझाव मिलते है उसको सीरियसली लेकर उसपर काम करती है यह सरकार, responsive है| ऐसा नहीं कि कोई जैसे ostrich होता है ना, ostrich अपनी जगह पर खड़ा रहता है, वह कभी हिलता नहीं है, बदलता नहीं है| हमने कभी वह एप्रोच रखा नहीं है|

प्रश्न: …. सर हर एक को होगा, चाहे कांग्रेसी हो, कम्युनिस्ट हो|

उत्तर: नहीं, हम कभी भी कोई नीति या कानून धर्म, जाति या राजनीतिक संवेदना देखकर नहीं बनाते| तो आप बेफिक्र रहिये, ऐसा अगर प्रॉब्लम आएगी और age के हिसाब से अगर फिंगर प्रिंट की प्रॉब्लम मेडिकली कन्फर्म होती है तो we will find a better solution. और ऐसी कोई चीज़ नहीं है जिसका सलूशन नहीं निकल सकता है| So please give us your feedback regularly, आज तो चलो हम मिल रहे हैं, अगली बार नहीं भी मिलें तो अपना पूरा सिस्टम है, यहाँ पर अनिल जी हैं, कपिल जी हैं, रमेश जी हैं, पूरी भाजपा की टीम है शिमला में सभी जगह पर| हम सब उपलब्ध हैं हमारे ईमेल पर जितने मेल आते हैं उसपर एक्शन लिया जाता है|

और यह कोई मैं कह रहा हूँ ऐसा नहीं है, पूरी सरकार में मन की बात के माध्यम से आपने कई बार सुना होगा, पीएम respond करते हैं जो सुझाव आते हैं, mygov जो हमारा पोर्टल है उसमें हजारों की संख्या में लोग अपनी शिकायतें भी दर्ज करते हैं, सुझाव भी देते हैं, तो so, this is a responsive government. और इसलिए भाषण देने के बदले I thought हम चर्चा करें क्योंकि तीन भाषण के बाद तो शायद क्षमता भी ख़त्म हो जाती है|

प्रश्न: आदरणीय पीयूष जी, धर्मेश बोल रहा हूँ; मेरा सबसे ज़रूरी बात यह बतानी है कि जीएसटी से अच्छा कानून शायद और कोई नहीं हो सकता| लेकिन इसकी इम्प्लीमेंटेशन में इतनी कमियां हैं कि हर इंसान आसानी से इसको नहीं समझ  सकता है, जैसे एक ही व्यापार करने वाले आदमी को, आप काजू ले लीजिये, काजू का अगर खरा काजू बेच रहा है तो उसपर 8% टैक्स है, उसमें नमक लगाकर बेच रहा है तो उसपर 12% टैक्स है, यह जो थोड़े बहुत डिफरेंसेस हैं – ऐनक है, ऐनक पीयूष जी आपने भी एक ऐनक पहन रखी है इनके शीशे पर अलग टैक्स है लेकिन इसके फ्रेम पर अलग टैक्स है| तो यह दोनों तरह के टैक्सेज अलग नहीं होने चाहिए, तो किन लोगो को लोगों को टैक्सेज देने चाहिए वह एक ही प्रकार के टैक्स होंगे तो कोई भी आदमी टैक्स देने के लिए पीछे नहीं हटता, लेकिन उसमें आसान  से आसान  तरीका हो, कम से कम उसको परेशानियाँ हो, उनको देने में कोई रुकावट न आये, इस ढंग से यह कानून को बनाया जाये तो हम सबसे पहले इसका स्वागत करेंगे और आज भी कर रहे हैं| और व्यापारी वर्ग को भी यह समझ लेना चाहिए कि जितना उसको जीएसटी लगने के बाद अपने कारोबार में फायदा हुआ है इतना उसको जीएसटी लगने से पहले फायदा नहीं था| जो भी कारोबार कर रहा है, एक ही जगह से उसको टैक्स लगकर उसके पास आ रहा है और आगे उसपर वह जीएसटी पर चार्ज  कर रहा है, उसके डिफरेंस के ऊपर ही सिर्फ उसको टैक्स देना पड़ रहा है, बाकी उसको टैक्स नहीं देना पड़ रहा है| लेकिन मैं फिर भी उनसे प्रार्थना करूँगा कि जो इसमें discrepancies हैं जो अलग-अलग किस्म के टैक्सेज हैं वह एक करके टोटल काजू पर 8% कर दिया जाये, 10% कर दिया जाये, किसी एक प्रकार का टैक्स हो ताकि उसको अलग-अलग किस्म के अलग-अलग फोर्स ना की जाए!!

Juices पर टैक्स 12%, सिरके पर टैक्स 18%, किसी और चीज़ पर टैक्स 28%, तो एक ही व्यापार करने वाला आदमी अलग-अलग किस्म का टैक्स देगा उसमें चोरी भी बढ़ेगी| जूते वाला 500 रुपये से ऊपर का बिल नहीं भरवा के लगाता क्योंकि 500 रुपये पर के जूते पर टैक्स 5% है और 500 रुपये से ऊपर का जो टैक्स है वह 18% है या कितना है, मुझे नहीं पता कितना है?

उत्तर: मैं इसका थोड़ा सा आपको भूमिका दे देता हूँ फिर आप तय करिए कि हमारी भूमिका ठीक है या नहीं है| स्वाभाविक है अगर एक ही रेट होता तो बहुत सरल हो जाता, एक लगभग जब सभी ओवरआल आउटपुट को जज किया और आउटपुट के सामने टैक्स कलेक्शन जज की तो लगभग 15.5% वह एक रेट आता है जिसको अगर हम फ्लैट रखते हैं, अनुमान है, फिर वह थोड़ा कम भी हो सकता है अगर लोग ईमानदारी से ज्यादा टैक्स भरें, बढ़ सकता है अगर पूरा टैक्स revenue न आये स्टेट्स की जो requirements हैं, सेंटर की requirements हैं, पर जिसको कहते है ना mathematical calculation और assumptions के बेसिस पर 15.5% यह एवरेज रेट आया है, सिंगल रेट|

पर भारत संपन्न देश अभी तक नहीं बना है, भारत में अभी भी inequality बहुत भयानक है, आज भी गरीबी है, गरीबी क्या कुपोषण जैसी बीमारियाँ हैं कि लाखों करोड़ों बच्चे malnutrition से परेशान हैं, suffer कर रहे हैं| भारत में एक तरफ एक पूरे एशिया का सबसे अमीर आदमी भी है और एक गरीब है जिसके पास दो वक्त की रोटी के लिए पैसा नहीं है| आज भी लाखों और क्या पता करोड़ों लड़के, लड़कियां, बच्चे रबर की चप्पल भी नहीं पहन सकते और दूसरी तरफ Bentley और Mercedes cars बिकती हैं देश में|

अब फ्रांस में शायद यूके में, कनाडा में और जीएसटी कोई बहुत ज्यादा देशों में नहीं आया है, बड़े देशों में तो जीएसटी आजतक आ ही नहीं पाया है, भारत पहला विश्व में बड़ा देश है जहाँ जीएसटी को लागू किया गया है| अमेरिका, चाइना में हिम्मत नहीं हुई है अभी तक जीएसटी करने की, single tax all across the country. वहां तो बटा हुआ है, अमेरिका में तो बहुत ही complicated है, फ़ेडरल अलग, स्टेट अलग और कानून ही अलग है टोटली| ऐसी परिस्थिति में क्या वह विश्व का या एशिया का सबसे अमीर आदमी और जिस व्यक्ति के पास रबर की चप्पल के भी पैसे नहीं हैं क्या दोनों के ऊपर एक टैक्स रेट हो सकता है? यह आप लोग विचार करिए, क्या रबर की चप्पल के ऊपर और Louis Vuitton के shoes के ऊपर या Prada के shoes के ऊपर एक ही टैक्स रेट हो सकता है इसपर आप विचार करिए| क्योंकि यह टैक्स रेट फिर इम्पोर्ट पर भी लगेगा और इम्पोर्टेड गुड्स पर भी यही टैक्स रेट लगेगा, तो क्या Mercedes जब इम्पोर्ट हो भारत में और जिस व्यक्ति की क्षमता है दो करोड़ रुपये की गाड़ी खर्चने की क्या उसके ऊपर और जो कच्चा काजू थोड़ा बहुत अफ्फोर्ड कर सके वह भी बहुत ही कम लोग होंगे| या एग्रीकल्चरल प्रोडूस जो आलू -प्याज मटर बनते हैं, क्या सबपर एक ही रेट हो सकता है जैसा लन्दन में है, जैसा पेरिस में है, जैसा टोरंटो में है? विचार करिए इस बात पर|

आप और हम ही इस रूम में जो बैठे हैं हमारी एक मिडिल क्लास, upper मिडिल क्लास, एक साधारणतः मैं यहाँ देख रहा हूँ सब professionals हैं, chartered accountants, हमारी अच्छी-बुरी जैसी भी practice हो हमारा घर संपन्न है| अब हमारे घर में अगर 100 ग्राम काजू आये उसका हमारे पूरे टोटल इनकम में क्या परसेंटेज है और एक गरीब के घर में शादी चल रही हो उसके घर में कुछ वस्तु आये, और वह तो शायद काजू वगैरा तो बेचारे कहाँ अफ्फोर्ड कर पाते होंगे, कोई ऐसी चीज़ अफ्फोर्ड करेंगे अपनी पॉकेट के हिसाब से लेकिन उसका जो बर्डन होगा उस वस्तु के ऊपर उनकी इनकम का क्या परसेंटेज होगा? समझो हम जूते खरीदते हैं, हमारी इनकम का क्या परसेंटेज है वह जूता और एक गरीब के घर में जब वह जूता खरीदता है उसकी इनकम का क्या परसेंटेज है?

आज एक करोड़पति व्यक्ति कितना भी खर्च ले आखिर क्या खर्चा करेगा? कपडे पर खर्चा कर लेगा, खाने-पीने पर कर लेगा, घर के किराए पर अगर किराए का घर हो नहीं तो लगभग हम सबका खुद का घर हो गया उस लेवल कि एक करोड़पति होगा| तो करोड़-दो करोड़ की आमदनी में अगर खर्चा कर भी ले, मैं अपना खुद का देखूँ कितना भी खर्चा कर लो तो क्या खर्च लेंगे महीने में लाख रुपये, 2 लाख रुपये, 3 लाख रुपये, 5 लाख रुपये? पर क्या एक मध्यम वर्गीय परिवार कोई 10,000, 15,000, 20,000, 25,000 रुपये महीना जो कमाता है उनके अगर खर्चे देखें तो उनकी तो बचत के लिए कुछ बचता ही नहीं है, पूरे महीने की इनकम ख़त्म हो जाती है| यह है कारण अलग-अलग टैक्स रेट्स रखने का कि 500 से सस्ता जूता हो तो उसको 5% लगे, 500 से ज्यादा हो तो उसको ज्यादा लगे|

और इस प्रकार से अभी के दिन हर एक वस्तु के जो टैक्स हैं जिसमें यह जो 17 टैक्स, 23 cesses यह सब सम्मिलित करके देश के हर स्टेट का आउटपुट लिया, हर स्टेट के टैक्स रेट्स को जमाख़ोरी की और एक weighted average निकाला, अगर कोई वस्तु महाराष्ट्र में 70% उत्पादन है या खपत है तो उसको weighted average दिया कि महाराष्ट्र में उस वस्तु पर एक्साइज, सर्विस टैक्स, सेल्स टैक्स, ओक्ट्रोई, एंट्री टैक्स, सब अलग-अलग टैक्स-सेस मिलाके क्या बोझ आता है| हिमाचल में उसका 3% है तो 3% weighted average हिमाचल के रेट का आ गया| ऐसे करके एक देश भर के रेट्स को एक फिटमेंट कमिटी, और यह कोई बीजेपी और कांग्रेस का सवाल नहीं है, सभी पार्टी के लोग उसमें हैं| 6 कांग्रेस की सरकारें हैं, हमारी कुछ सरकारें हैं, कम्युनिस्ट की कुछ सरकारें हैं केरल और त्रिपुरा की, तृणमूल सरकार है वेस्ट बंगाल की, आम आदमी पार्टी तक इसमें involved है, दिल्ली की सरकार की| सब लोगों ने बैठकर सर्वसम्मति से यह unanimous decisions लिए हर एक रेट के ऊपर, प्रोसीजर के ऊपर, और सबके ध्यान में है कि यह तो एक unknown animal है, किसी को पता नहीं कि कैसे जाकर आगे टैक्सेज कलेक्ट होंगे, कम होंगे, ज्यादा होंगे| जैसे-जैसे formalize होगी, ईमानदार व्यवस्था में सब लोग जुड़ेंगे, टैक्स बेस  बढेगा, और टैक्स अधिक मात्रा में आएगा तो टैक्स रेट्स कम करने के लिए हमारे हाथ में ताकत आएगी|

और आपने देखा होगा गत 4-5 जीएसटी कमिटी मीटिंग्स में सैंकड़ों ऐसे आइटम हैं जिसके टैक्स रेट्स को कम किया गया है, यह अपने आपसे थोड़े ही हुआ, आप लोगों का फीडबैक मिला, जनता का फीडबैक मिला इसलिए हुआ| अभी भी ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर्स ने सुझाव दिया कि यह 18% टैक्स रेट बहुत ज्यादा है, टूरिज्म, पर्यटन में भी नुकसान देता है, सामान्य आदमी, मध्यम वर्गीय आदमी भी आज एक रविवार के दिन अगर राजेश शर्मा उनको यहाँ न बुलाये और परेशान न करे तो शायद किधर जाकर भोजन करेगा restaurant में अच्छा परिवार के साथ| तो उन्होंने सुझाव दिया सभी का 12% कर दिया जाये और इनपुट टैक्स न लें क्योंकि साधारणतः कोई restaurant ने इनपुट टैक्स का बेनिफिट दिया ही नहीं, सबने जो existing menu था या रेट कार्ड था उसी पर अपना टैक्स रेट बढ़ाकर 18 कर दिया|

तो फिर यह तय हुआ कि चलो, मतलब कमिटी ने recommend किया 9-10 तारीख को लगभग तय सा हो जायेगा ऐसा अनुमान है| अलग-अलग उनके कई अच्छे सुझाव हैं जो कमिटी ऑफ़ ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर्स ने सुझाव दिए हैं जैसे एक परेशानी थी कि हमारे कुछ exempt goods हैं, कुछ taxable goods हैं, अलग-अलग हिसाब रखो यह वोह तो उन्होंने कहा अच्छा उनको सिर्फ हाफ परसेंट कर दो, तो सुविधाजनक हो जायेगा अलग-अलग पूरा डिटेलिंग नहीं करनी पड़ेगी| हाँ कोई अलग रखना चाहे तो exempt को exempt रखते हुए बाकी पर नार्मल कम्पोजीशन का रेट भी दे सखते हैं|

तो अच्छे सुझाव GOM में, और यह कोई GOM अपने मन-मर्ज़ी से नहीं व्यापारी वर्ग, उद्योग जगत के लोगों से ही चर्चा करके, खासतौर पर छोटे लोगों को कैसे लाभ हो, छोटे उद्योग और व्यापार को कैसे लाभ हो, उसी पर उन्होंने अपने आपको सीमित रखा| इंटर-स्टेट सेल्स की एक समस्या आ रही थी उसको resolve किया|

मुझे लगता है जैसे-जैसे formalize होगी इकॉनमी, लोग और ईमानदार व्यवस्था में जुड़ेंगे, और मैं यह नहीं कहना चाहता हूँ कि लोग बेईमानी करते थे इसके लिए यह किया जा रहा है, मैंने जैसे स्पष्ट किया देश में inequality बहुत है, गरीब की वस्तुओं पर सस्ता टैक्स हो, कम टैक्स हो, मध्यम वर्गीय पर मध्यम वर्ग का टैक्स हो, अमीर आदमियों की वस्तुओं पर सेस वगैरा लगाकर जो महँगी गाड़ियाँ हैं रेंज रोवर और जैगुआर और सब बड़ी महँगी गाड़ियों पर ज्यादा रहे| और आहिस्ते-आहिस्ते इसको कनवर्ज करेंगे, आहिस्ते-आहिस्ते कोशिश करेंगे रेट्स कम हों, और हर मीटिंग में इस विषय के ऊपर वो लोग चर्चा करते हैं| वित्त मंत्री ने खुद कहा कि उनके मन में है कैसे रेट्स और स्लैब्स को कम किया जाये, कितना जल्दी हम और सुविधा दें जनता को कि टैक्स का बर्डन और कम हो|

तो यह तो एक continuous exercise रहेगी, 9-10 को गुवाहाटी में मीटिंग है उसमें आपको बहुत सारी और खुशखबरियां मिलेंगी, पिछली मीटिंग में भी काफी महत्वपूर्ण और सरलता लाने की कोशिश की गयी है| और आगे चलकर कुछ और सुझाव आयेंगे तो और सुधार करेंगे| We are not like ostrich. We have an open mind. हाँ, मैं आपकी बात कबूल करता हूँ कि जो software बना, उस software में flexibility थोड़ी और रहती, कोई rectify करना है, किसी की गलती यह वह, तो ज्यादा अच्छा रहता, मैं आपसे सहमत हूँ| मैंने भी जब पहले शुरू में प्रोसीजर समझा मुझे तो बहुत ही अच्छा लगा था कि यह literally permanently इस देश की व्यवस्था को सुधार देगा तो अगर software में ही वह चीज़ जो हमारी कल्पना है, वह सुधार आ जाता है तो मुझे लगता है जैसा राजेश जी ने कहा यह matching of invoices वगैरा एक बार settle down हो  जाये उसके बाद इतना सरल हो जायेगा जो मैं पहले दिन से कह रहा हूँ| हम सबको अपना sales invoice enter करना पड़ेगा, और कुछ नहीं, बाकी चीज़ें आटोमेटिक कंप्यूटर करेगा, यहाँ तक कि हमें टैक्स कितना भरना है वह भी कंप्यूटर जनरेटेड होगा हमें बैठकर उसको रिटर्न के रूप में नहीं देना पड़ेगा|

पर हाँ teething troubles हैं इसको आप सबका आशीर्वाद मिलता रहे, आप सबके सुझाव और मार्गदर्शन मिलता रहे तो इसको सुधारते रहेंगे| Software, आप यह जानते हैं जो software इतने बड़े विशाल 125 करोड़ के देश को serve करता है उसको tight रखना पड़ता है, नहीं तो उसमें कमियां रह जाएँगी, उसमें गलतियाँ हो जाएँगी, tight रखते हो तो सुधारने के लिए भी ज़रा समय लगता है| इसमें एक-एक सुधार मुझे बोला गया तीन महीने लगते हैं इसके software में change करने के लिए, क्योंकि इतने firewalls डाले हैं, हम सब जानते हैं कि firewalls डाले जाते हैं कि cyber attack न हो जाये, software को misuse न करे, कोई गलत न हो जाये उसके लिए बहुत ज्यादा इसमें जब programming language में बहुत ज्यादा safety buffers रखे जाते हैं तो मुझे लगता है इसको और थोड़ा समय दिया जाये|

प्रधानमंत्री ने पहली जुलाई को ही कहा था कि तीन महीने के हम अनुभवों से फिर क्या सुधार लाना है उसपर मेहनत करेंगे, फिर 6 महीने बाद और क्या सुधार करना है, कैसे-कैसे टैक्स revenues को मॉनिटर करेंगे उसके हिसाब से टैक्स रेट्स में क्या फेर-बदल करने की ज़रूरत पड़े वह करेंगे| तो मुझे पूरा विश्वास है कि थोड़ी कठिनाइयाँ रही हैं इसको हमने सबने झेला है, उसके लिए मैं आपका धन्यवाद करता हूँ, आपका वास्तव में तहे दिल से आपको कहना चाहूँगा कि पूरी हमारी सीए कम्युनिटी ने जिस प्रकार से जीएसटी का समर्थन किया, जिस प्रकार से इसका स्वागत किया मेहनत के बावजूद, मुझे याद है रात-रात भर यह लोग मुझे फीडबैक देते रहते थे कि अभी रिटर्न अपलोड नहीं हो रहा है, 500 इनवॉइस से ज्यादा ले नहीं रहा है, ऑफलाइन मोड में डालो, कई बार सुझाव आता है कि थोड़े समय के लिए manual allow कर दो कि manual returns दे सके जब तक यह पूरा सॉर्ट आउट नहीं होता| अलग-अलग सुझाव आते हैं, हर एक पर विचार होता है, ऐसा नहीं कि हम कोई आपके सुझाव बस नाम मात्र के लिए मीटिंग करी, सुना और छोड़ देंगे|

तो यह continuous process है, इस continuous process में सुधार भी होगा, जो कमियां सामने आएँगी उसको ठीक किया जायेगा, रेट्स आहिस्ते-आहिस्ते कनवर्ज होंगे, छोटे व्यापारी को तो वैसे भी अभी कम्पोजिट स्कीम बहुत ही सरल हो गयी, डेढ़ करोड़ तक हो गयी| तो इस प्रोसेस के थ्रू गुज़रकर, जैसा भाई साहब राजेश जी ने कहा कि जब बिल्डिंग बनती है तो पहले तो फाउंडेशन के लिए कचरा निकालना पड़ता है, मिट्टी खोदनी पड़ती है बड़ी गन्दगी आती है, बड़ी धूल उड़ती है चारों तरफ| यह वह समय है जब फाउंडेशन बन रही है जीएसटी की और यह ऐसी फाउंडेशन बनेगी जो साल-6 महीने के लिए नहीं, दशकों तक इस देश को सेवा कर पायेगी|

तो इसलिए फाउंडेशन भी स्ट्रोंग बनानी पड़ेगी, स्ट्रोंग फाउंडेशन के लिए थोड़ा समय भी लगता है, उसके डिजाईन में सुधार करते रहना पड़ता है कि एकदम सॉलिड फाउंडेशन बने, तभी तो बड़ी सौ मंजिला बिल्डिंग बना पाएंगे न उसके ऊपर| तो यह इसके पीछे भावना थी अलग-अलग रेट्स के, समस्याएं हैं पर मुझे पूरा विश्वास है कि हम इन समस्याओं को भी सरलता से overcome कर लेंगे, आपका समर्थन, साहस, थोड़ी बहुत पेशेंस मिलती रहे, सपोर्ट मिलता रहे, SSCs को आप डराएँ न उनका मनोबल बढ़ाते रहें कि चिंता मत करो कोई तकलीफ नहीं आएगी| और मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ, वास्तव में तो मेरी ज़रूरत नहीं है प्रधानमंत्री ने बीदर कर्नाटक में उस दिन जन सभा में कहा सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि कोई भी व्यापारी को परेशान नहीं किया जायेगा, कोई भी व्यापारी जो शायद पहले के ज़माने में पूरी तरीके से टैक्स से जुड़ा नहीं भी होगा उसको भी परेशान नहीं किया जाये, किसी को इस प्रकार की कठिनाई आये तो हमारे जनप्रतिनिधि या लोकल लीडर्स से संपर्क करें, वह हम तक पहुंचा सकेंगे| हम चाहते हैं कि हर एक को मौका मिले एक ईमानदार व्यवस्था में पूरी तरीके से जुड़ जाने का, जब सब लोग जुड़ जायेंगे तो टैक्स के रेट्स भी कम करने में हमारे हाथ मज़बूत होंगे|

खुले दिल से पूछिए, कोई इसमें अन्यथा नहीं लिया जायेगा, जो भी आपके मन में अगर कुछ भी व्यथा हो, कुछ भी आपके यहाँ परेशानी हो, खुले दिल से पूछ लीजिये|

प्रश्न: मेरे सीए मित्रों की तरफ से एक शिकायत भी है और सुझाव भी है वह यह है कि जीएसटी रिटर्न को revise करने की कोई ऑप्शन नहीं है?…3 साल से होती है उसको revise करने के ऑप्शन जो है वह ज़रूर होनी चाहिए?

उत्तर: वह तो मैंने अभी कहा कि वह हमने नोट किया है| एक में ऐसे ही बता दूं इसके पीछे जो कल्पना थी वह मैं आपको शेयर कर सकता हूँ और हम लोग सब उसके एक्सपर्ट्स हैं| इसलिए मैं कह रहा हूँ क्योंकि हिमाचल में तो revised income tax return का सहारा लेकर काफी कुछ चीज़ें कवर करने की कोशिश की जा रही है| और मुझे लगता है सभी जानते हैं क्योंकि यहाँ पर कोई भी हैरानगी का फेस मुझे दिखा नहीं कि क्या हो रहा है|

तो revise return के माध्यम से कई बार गलतियों को भी cover… गलतियाँ जहाँ तक genuine गलती है उसको ठीक करने का तो मौका अभी भी है, थोड़ा you know, it’s a complicated, circuitous route कि आपको फ़ोन करना पड़ता है, वह unlock करते हैं, correct करते हैं| वह इसलिए रखा गया था,पता नहीं अभी तक लागू किया है कि नहीं, मुझे मालूम नहीं, लागू नहीं किया है, पर   actually जो कल्पना थी कि अगर हम revise return computer पर ही allow कर दें तो जो matching होनी है वह matching होने के बाद आदमी अपना revise return से निकाल दे तो जो purchaser है वह परेशान हो जायेगा, उसका भी input tax credit reverse हो सकता है| तो इसलिए automatic revision on the computer allow नहीं रखा गया है और यह कल्पना थी कि एक help desk होगी, call centre, जिसपर assessee फ़ोन करके अपना revise कर सकता है और वह call centre फिर ensure करेगा कि किसी और के ऊपर बोझ न आये|

अगर अनिल जी ने कुछ कपिल जी से ख़रीदा और उसके हिसाब से अपने टैक्स उनका मैचिंग हो गया इनवॉइस और टैक्स भर दिया और फिर कपिल जी वह इनवॉइस को रिवर्स कर दें, चेंज कर दें कुछ संशोधन कर दें तो इनको तो कुछ नहीं नुकसान तो अनिल का होगा| तो इसलिए इसको आटोमेटिक नहीं रखा था एक कॉल सेंटर के थ्रू जिससे दोनों की सहमति से ही वह हो सके, यह कल्पना थी, शायद लागू नहीं हुई है वह लागू होने जा रही होगी| पर यह बात सच है कि कुछ न कुछ जेन्युइन गलतियों के लिए सुविधा होना आवश्यक है और वह रख ली जाएगी, that I can assure you.

प्रश्न: पीयूष जी के चरणों में प्रणाम करते हुए कहूँगा सर, एक जो आपने यहाँ पर जो डेढ़ करोड़ रुपये की आपने कहा कम्पोजिट स्कीम….

उत्तर: सुझाव आया है ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर्स द्वारा|

प्रश्न: या ठीक है डेढ़ करोड़ रुपये यहाँ का या एक करोड़ रुपये जो भी.. हिमाचल या जितने भी पर्वतीय क्षेत्र हैं उनमें आपने 75 लाख रुपये किया हैं, एक करोड़ से 75 लाख| सभी जगह जबकि एक करोड़ है हमारे यहाँ पर 75 लाख है, क्या उसे आप एक करोड़ रुपये करेंगे या जो भी डेढ़ करोड़ रुपये आपका प्रस्ताव होगा आना वाला उसको एक या डेढ़ करोड़ रुपये करेंगे आप यहाँ पर?

उत्तर: इसके बारे में वित्त मंत्री जी ने पीछे बयान दिया था कि शायद हिमाचल की सरकार का ही मानना था कि छोटा राज्य है, यहाँ पर व्यापारी छोटे ज्यादा हैं तो इतना हाई लिमिट होगा तो हमारे यहाँ के लोकल टैक्सेज ही बहुत कम हो जायेंगे| इस करके यह लिमिट तय हुई है, और वित्त मंत्री is on record to say कि नयी सरकार एक बार आ जाये, अब तो model code है, आचार संहिता है तो शायद पता नहीं modify होगा कि नहीं मुझे मालूम नहीं है| पर नयी सरकार आ जाये या यहाँ की सरकार request करती है अगर GST Council को तो यह निर्णय एक मैं ज़रूर आपके समक्ष रखना चाहूँगा इसमें जो भी सुधार करना है चाहे रेट का, चाहे procudure का, चाहे लिमिट का, यह कोई मोदी जी या अरुण जी के व्यक्तिगत हाथ में नहीं है|

अब क्या है कि केंद्र सरकार ने अपने सब powers GST Council के समक्ष रख दिए हैं, GST Council is the empowered body. उसमें हर राजनीतिक पार्टी के प्रतिनिधि हैं, हर State के Finance Ministers हैं और वह GST Council निर्णय लेती है| अभी यह आ गयी रिपोर्ट, हिमंत विश्व शर्मा, असम के वित्त मंत्री की, सुझाव आ गए हैं, अगर हमारे हाथ में होता तो हमने अभी तक स्वीकार करके इसको implement कर दिया होता| लेकिन अब GST Council जब 9-10 को गुवाहाटी में बैठेगी वही empowered body है इसको accept, reject या कुछ भी करने के लिए, पर यह सुझाव इतने अच्छे हैं कि हमें लगता है कि यह सभी accept हो जाने चाहिए|

Similarly, जब state government यहाँ की अगर मानती है कि यहाँ डेढ़ करोड़ जो बाकी देश में है वैसा ही रखना चाहिए तो मुझे लगता है GST Council is empowered to accept that, कोई दिक्कत नहीं आनी चाहिए| और वास्तव में as a व्यापारी तो मैं सोचता हूँ हर एक स्कीम में, मैं जब सौर ऊर्जा की स्कीम बनाता था तो बाकी देश में जो सुविधा देता था उससे एक्स्ट्रा हिमाचल और उत्तराखंड और पहाड़ी इलाकों को और नार्थ ईस्ट को देता था| यह अटल जी ने शुरू किया था, आपको याद होगा, अटल बिहारी वाजपेयी जी ने पहाड़ी इलाकों को एक्स्ट्रा देने की प्रक्रिया शुरू की थी क्योंकि यहाँ पर लोगों को कठिनाई भी ज्यादा bear करनी पड़ती है, दूर दार से ट्रांसपोर्ट कास्ट काफी लोड हो जाता है, लाते हुए भी जाते हुए भी| आपकी अपनी समस्याएं हैं उस कारण से अटल जी ने शुरू किया था कि पहाड़ी क्षेत्रों को अधिक लाभ मिले| यह अलग बात है कि कुछ लोगों ने उसका भी मिसयूज बड़ा जमकर किया| यूनिट्स यहाँ लगी जो पेपर पर ही रही, पैकेजिंग यूनिट लगी सिर्फ tax exemption के लिए, उत्तराखंड में भी हुआ, यहाँ भी हुआ उसको भी हमें विचार करना पड़ेगा कि कैसे रोकें नहीं तो एक unfair disadvantage आपके neighboring states को हो जाता है, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा को उसका नुकसान होता है अगर एक प्रकार से सिर्फ tax planning के लिए फर्जी या optical कंपनियां यहाँ लग जायें और बाकी सब प्रदेशों का नुकसान हो जाये|

पर खैर हमारी संवेदना यह रही है कि पहाड़ी इलाकों को अधिक दिया जाये और यहाँ पर काम व्यापार करना उतना ज्यादा अधिक दिक्कत वाला भी होता है, तो मेरे हिसाब से तो रेट सभी जगह same limits कर दें तो fair होगा और हिमाचल के भी हमारे व्यापारी भाईयों को और व्यापारी वर्ग को दिक्कत नहीं आएगी और कम्पटीशन में बाकी प्रदेश के साथ पूरी जमकर खड़े हो सकेंगे|

प्रश्न: मुझे तो यह समझ में नहीं आ रही है कि लोग एक करोड़ या डेढ़ करोड़, या 75 लाख या 70 लाख लेकर के अपने आपको exempt क्यों करवाना चाहते हैं, क्योंकि जिसके पास जीएसटी नंबर नहीं है वह नुकसान में है, जीएसटी नंबर लेकर के ही फायदा है क्योंकि उसके सिर्फ प्रॉफिट वाली उसको टैक्स आगे देना है| Otherwise तो उसका टैक्स पूरे का पूरा इनपुट आ रहा है और इनपुट लेकर के वह टैक्स कोई अदा नहीं कर रहा पूरी तरफ से…. नंबर 2, उसका कंप्यूटर ही अपने आप सब कुछ अपना काम करवा रहा है, कोई किसी की सहायता किसी को आवश्यकता नहीं पड़ेगी| सिर्फ थोड़ा सा फर्क इतना है जो छोटा व्यापारी वर्ग है वह शायद इस बात से घबरा रहा है कि मैं अपना कंप्यूटर बाहर रखूँगा या मैं कंप्यूटर को कैसे उसको लूँगा या मैं कंप्यूटर रखूँगा या नहीं रखूँगा जिसकी रोज़ सेल मुश्किल से 2000 या 3000 या 4000 रुपये, वह इस इस बात से अपने आपको….?

उत्तर: उसको तो exempt है, वह तो टोटली exempt है|

प्रश्न: लेकिन क्योंकि मैं भी व्यापारी हूँ, और व्यापारी होने के नाते जहाँ-जहाँ मैं काम कर रहा हूँ वही आदमी compete कर पा रहा है मार्किट के अन्दर, जिसने जीएसटी का नंबर ले रखा है, जिसने जीएसटी नंबर नहीं ले रखा वह compete ही नहीं कर पायेगा और कम्पटीशन अगर नहीं कर पायेगा तो वह व्यापार कैसे कर पायेगा, मेरी समझ में यह नहीं आता?

उत्तर: भाई साहब ऐसा है कि आपकी बात एकदम सौ आने सही है, in the long run, आहिस्ते-आहिस्ते जो आपने बात कही आपका तो तजुर्बा है इतना लम्बा आपने तो इस बात को तुरंत पकड़ लिया| एक छोटा व्यापारी, और इसमें भी देखिए थोड़ा बहुत तो राजनीतिकरण चलता ही है, तो कुछ राजनीतिक पार्टियों ने जो वास्तव में जीएसटी काउंसिल के पार्ट हैं, कांग्रेस के 6 मिनिस्टर्स हैं उसमें| अभी तक कांग्रेस-मुक्त भारत हुआ नहीं है ना तो 6 मिनिस्टर तो कांग्रेस के भी हैं जीएसटी काउंसिल में तो वह …. मुझे लगता है मेरा व्यंग्य एकदम वेस्ट हो गया| पर यह 6 मंत्री भी पूरे हर निर्णय में सम्मिलित हैं तो यह exactly वह किस्सा हुआ कि मनमोहन सिंह ने Ordinance लाया लालू प्रसाद यादव को भ्रष्टाचार से बचाने के लिए और फिर राहुल बाबा आये और उस Ordinance को फाड़के नाटक किया जैसे कोई मैं धर्मात्मा हूँ और मैं यह भ्रष्टाचारी लोगों को बचाने नहीं दूंगा सरकार को|

तो इनके 6 मंत्रियों ने तो सब सहभागिता से, सर्वसम्मति से सब कुछ रेट्स हो, प्रोसीजर हो, कंप्यूटर सॉफ्टवेर हो, सबमें भाग लिया और फिर एक नेता आता है और सब रोज़ गाली देना शुरू कर देता है जीएसटी को, यह समझ नहीं आता कि इतनी भी क्या इंटरनल डेमोक्रेसी है कि आपस में एक-दूसरे से सहमति भी नहीं कर सकते कोई चीज़ पर|

लेकिन मैं आपकी बात से सहमत हूँ कि यह आहिस्ते-आहिस्ते यह राजनीतिकरण से लोग ऊपर उठेंगे, समझ जायेंगे कि हमें भ्रमित किया जा रहा है और इसके लाभ जैसे-जैसे नीचे तक पहुंचेंगे तो छोटा व्यापारी भी कम्पोजीशन से निकलकर फुल टैक्स में जाना चाहेगा क्योंकि उसमें उसका व्यापार बढ़ेगा| पर जब तक सब लोगों को इस बात की पूरी समझ न हो या अगर कुछ लोग वास्तव में कंप्यूटर से intimidate होते हैं, डरते हैं या नहीं चाहते ज्यादा रिकॉर्ड रखना वगैरा उनके लिए जितना हम liberal schemes भी options रखेंगे उतना इसकी acceptability अच्छी हो जाएगी GST की| तो हमारी तरफ से कोशिश यह है कि छोटे को mental pressure या उनको डर न लगे या intimidate या चिंता में न आ जाये, सुविधा रहनी चाहिए फिर आहिस्ते-आहिस्ते जैसे पूरे विश्व में हुआ है जहाँ-जहाँ पर GST लगा कि छोटों ने भी उसका लाभ लिया और पूरा व्यापार official होने लग गया|

मतलब मेरा तो मानना है as a colleague Chartered Accountant आप सबके साथ कि यह जो नयी व्यवस्था है इससे पूरी इकॉनमी को जो उछाल मिलेगा इसमें हम सबका भी chartered accountants का, व्यापारियों का, उद्योग जगत का, सभी का लाभ है| और सभी को और additional जैसे-जैसे economic growth होता है तो सबके businesses बढ़ते हैं, सबकी services और लोगों को लगती हैं, capital बढ़ता है उद्योग करने वालों का, व्यापारियों का उस capital की लागत से और वह नया अपना business expand कर सकते हैं| तो यह देश हित में किया गया काम है और यह जैसे-जैसे आप लोगों के सुझाव आयेंगे, जैसे-जैसे थोड़ा समय बीतेगा और डर निकल जायेगा|

मैं आपको एक चीज़ बताना चाहूँगा, शेयर करना चाहूँगा, मेरा व्यक्तिगत पक्का मानना है और मैं दावे के साथ कहता हूँ कि वास्तव में टैक्स न देने की किसी की भी इच्छा नहीं होती नार्मल कोर्स में| मैंने आंकलन लगाया है कि तीन प्रकार के लोग हैं जो टैक्स नहीं देते और सबसे ज्यादा हल्ला और आवाज़ उधर से ही आ रही है| और यह तीन में ऐसा नहीं है कि सब बेईमान हैं या टैक्स नहीं देना चाहते, एक वर्ग ऐसा है जिसको या तो राजनीतिज्ञ लोग या अधिकारीगण टैक्स नहीं देने की सलाह देते हैं या उसको मज़बूत करते हैं क्योंकि रिश्वत मांगते हैं, पोलिटिकल डोनेशन मांगते हैं, तो आदमी बोलता है रिश्वत ही देनी है तो फिर टैक्स क्यों भरना?

कई लोग मजबूर हो जाते हैं इस प्रकार से पूरा टैक्स न भरने के लिए, और मैं तीनों पर आऊंगा क्यों मैं सोचता हूँ कि अब बदलाव आ रहा है| दूसरा एक वर्ग है, दिल्ली की कई ऐसी मार्केट्स हैं मैं नाम नहीं लूँगा पर आप सब भलीभांति जानते हैं जहाँ पर शुरू में एक व्यक्ति ने टैक्स देना बंद किया, 10 में से 1 नहीं देता था, 9 देते थे, चल जाता था काम| आहिस्ते-आहिस्ते दूसरे का लालच बढ़ गया, दूसरे ने टैक्स देना बंद किया, अब जब दो लोग टैक्स नहीं भरेंगे तो उनका सामान सस्ता होने के कारण, स्वाभाविक है उपभोक्ता ज्यादा उधर जाने लग गए, हमारे देश में बिल लेना, नहीं लेना इसके बारे में जागरूकता या एक जिसको कहते है ना national spirit इतनी ज्यादा अभी तक बनी नहीं है| भाई बिना बिल सस्ता मिलता है, ले लो| तो उसका व्यापार बढ़ने लग गया, बाकी 8 के सामने कोई ऑप्शन नहीं था, या तो व्यापार बंद कर दो, या join the bandwagon. In Rome do as the Romans do वाली स्थिति हो गयी|

तो यह 8 मजबूरी में आहिस्ते-आहिस्ते उनको भी टैक्स की चोरी करनी पड़ी कम्पटीशन में खड़ा रहने के लिए और पूरी मार्किट की मार्किट फिर बिगड़ गयी| अब थोड़ा समय लगेगा सबको समझने में कि यह व्यवस्था लम्बी नहीं चल सकती, व्यवस्था बदलने की आवश्यकता है|

और एक तीसरा वर्ग है जो शायद जिसका मन ही नहीं है टैक्स भरने का जो चोरी करने में ही विश्वास रखता है, उसका हम कुछ नहीं कर सकते हैं, उसके लिए इन्वेस्टीगेशन विंग वगैरा अपना काम करेगी| उस तीसरे को छोड़ दो, जो दूसरा वर्ग है जो ज़बरदस्ती जिसको कम्पटीशन में खड़े रहने को यह करना पड़ा उसके लिए सुनहरा मौका है, उसके लिए हम सबको भी मदद करनी है, उसके लिए उपभोक्ता को भी जागरूक होना पड़ेगा, उपभोक्ता को मांगना पड़ेगा भाई मुझे एक पक्का बिल दो जीएसटी नंबर के साथ, या अगर आप exempt category में हो तो certify करके दो आप exempt हो|

जब उपभोक्ता जागरूक होगा, जब बाकी 8 लोग ज्वाइन करने के बदले whistleblower बन जायेंगे, डिपार्टमेंट को बोलेंगे भाई यह दो लोग टैक्स नहीं भर रहे हैं, हमारा व्यापार भी खराब कर रहे हैं| तब हम उस second category को रोक पाएंगे, इसमें आपका भी आशीर्वाद चाहिए, समर्थन चाहिए| जब CA बोलेगा मैं shell company के लिए audit report नहीं दूंगा तब shell company, hawala company बंद होगी|

तो इसमें तो सार्वजनिक रूप से मैं कह रहा हूँ हम सबको समर्थन देना पड़ेगा, देश ठीक करने का काम दूसरे का नहीं हो सकता है अकेले में, हम सबकी ज़िम्मेदारी है, मोदी जी अकेले देश नहीं ठीक कर सकते हैं| हम सब उपभोक्ता भी हैं, हमको लालच अगर आ जाये कि यार बिना बिल के टाई मिल रही है 10% कम में तो ले लो, फिर हमारा क्या अधिकार है कि हम मोदी जी से डिमांड करें कि आप इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारो? हम डिमांड करें कि कुपोषण ख़त्म करो? हम डिमांड करें कि स्वास्थ्य सेवाएं सुधारो, शिक्षा की स्थिति सुधारो? अगर वह हम डिमांड करते हैं तो जब हम कुछ चीज़ खरीदने जायें तो हमको बिल भी डिमांड करना चाहिए न कि टैक्स पेड सामान लेंगे चाहे 10% ज्यादा हो, तब जाकर चोरी रुकेगी|

और जहाँ तक अधिकारी या राजनीतिक corruption का सवाल है हमने तो legitimize कर दिया है कि सबलोग डोनेशन देना भी चाहें, और आखिर राजनीतिक पार्टी चलती है, उनको फंडिंग की आवश्यकता भी होती है| अगर ज्यादा से ज्यादा लोग – मैं कोई यहाँ fund collection के लिए नहीं आया हूँ तो गलत मत समझ लेना – अगर अधिकांश ज्यादा से ज्यादा लोग ऑफिशियली, जो भी चुनना चाहें, जो भी समर्थन देना चाहें जिस भी पार्टी को देना चाहें, मैं नहीं कह रहा हूँ सिर्फ बीजेपी को दो, जिस पार्टी को जिसको जो पार्टी अच्छी लगती है, ईमानदार लगती है, अच्छा नेतृत्व लगता है, अगर चेक से, ऑफिशियली डोनेशन पर और अगर डरता है देने से ऑफिशियली तो हमने यह भी सुविधा अभी आगे की है कि electoral bonds introduce करने का प्रावधान बजट में दिया है|

तो हमारी कोशिश है कि ज्यादा से ज्यादा ईमानदार पैसा राजनीतिक व्यवस्थाओं को चलायें, चुनावों को चलायें| अधिकारियों की तन्ख्वाएं काफी बढ़ गयी हैं 7th Pay Commission के बाद कि अब कोई बहाना नहीं रहा भ्रष्टाचारी होने का, अब कोई भ्रष्टाचार करे तो आपको complain करके उसको गिरफ्तार करवाना चाहिए| जब हम सब लोग मिलकर करेंगे तभी देश सुधर सकेगा, देश सुधारने का काम एक हाथ से नहीं होगा| 125 करोड़ कदम उठने पड़ेंगे तब देश सुधर पायेगा और मुझे पूरा विश्वास है कि हिमाचल की जनता एक ईमानदार सरकार चाहती है, एक ईमानदार व्यवस्था चाहती है और जब हम सब मिलकर एक ईमानदार व्यवस्था चाहेंगे तब शत-प्रतिशत ईमानदार व्यवस्था बन पायेगी| और मुझे तो संकेत जो दिख रहे हैं हिमाचल के मुझे लगता है कि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड जहाँ 80% सीटें भाजपा को मिली थी शायद हिमाचल आगे चलकर वह रिकॉर्ड भी तोड़ने जा रहा है|

प्रश्न: पीयूष जी नमस्कार, मेरा प्रश्न जीएसटी से थोड़ा हटकर के है| मेरा प्रश्न डिजिटल इंडिया के तरफ आपको ले जाऊंगा, प्लास्टिक मनी की बात हमारे प्रधानमंत्री जी बार-बार करते हैं, हाँ, मोबाइल मनी और प्लास्टिक मनी की बात कर रहे हैं| लेकिन जो हमें दिक्कत, परेशानी आ रही है वह आ रही है चार्जेज को लेकर के, तो यह charges कब तक हम expect करें कि थोड़े….

उत्तर: बहुत अच्छा सवाल है क्योंकि digitalize करना और formalize करना economy को digital के माध्यम से यह विमुद्रीकरण का एक बहुत बड़ा objective और इसपर हम और तेज़ गति से बल देना चाहते हैं| मेरे पास रेलवे मंत्रालय है उसपर जब आप online booking करो पहले एक service charge लगती थी, आपको ध्यान होगा वह हमने हटा दी थी demonetization के बाद, अब एक छोटा चार्ज लगता है जो रेलवे का चार्ज नहीं है, यह MDR (Merchant Discount Rate) है जो card companies या digital companies चार्ज करती हैं रेलवे पर| मैंने उनसे चर्चा शुरू कर दी है कि वह भी चार्ज न हो और जो अगर छोटा मोटा कोई चार्ज होगा तो रेलवे उसको भरेगा और online booking और cash payment की बुकिंग को same करना चाह रहा हूँ लेकिन मैं cash payment को थोड़ा बहुत एक प्रकार से dissuade करना चाह रहा हूँ, I don’t want to allow people or encourage people for cash payment.

तो मैं एक सिस्टम बनाने की सोच रहा हूँ कि जिसमें हम कुछ co-branded card या कुछ मुफ्त में दे लोगों को debit card या कुछ और उसके माध्यम से ज्यादा से ज्यादा लोग pay करें, Aadhar-linked होगा वो तो उससे आपको same charge पर online booking and cash payment same कर दूंगा लेकिन gradually तो cash payment को eliminate करने के लिए थोड़ा disadvantage cash payment का रखना पड़ेगा, digital payment को प्रोत्साहन और सुविधा देनी पड़ेगी| आजके दिन एकदम reverse है, तो वह परिस्थिति को बदलने की मैं कोशिश कर रहा हूँ रेलवे में| बाकी ओवरआल में क्रेडिट कार्ड पर charges लगते हैं क्योंकि उसके साथ क्रेडिट जुड़ा हुआ है, क्रेडिट कार्ड के charges पर सरकार दखलंदाजी नहीं दे सकती है लेकिन डेबिट कार्ड भी, यह जो जितने applications हैं इसपर हम highest level पर चर्चा कर रहे हैं, प्रधानमंत्री जी स्वयं चिंता कर रहे हैं और उनकी तो दिलीइच्छा है कि इन सबके charges near-zero कर दिए जायें, मतलब आप लाख रुपये की भी transaction online करो तो चार्ज 1-2 रुपये से ज्यादा नहीं होना चाहिए, छोटे transactions के लिए तो कोई चार्ज नहीं होना चाहिए लगभग ऐसा आदेश है प्रधानमंत्री जी का| और इसको हम आहिस्ते-आहिस्ते, actually आहिस्ते-आहिस्ते नहीं, जल्दी इसको लागू करेंगे, इसपर चर्चा और विचार चल रहा है कैसे डिजिटल को और एक बड़ा धक्का दिया जाये तो आप इसपर और अच्छी good news जल्द सुनने वाले हैं|

Digital payment safe होती है, digital payment convenient होती है और digital payment सस्ती होती है, यह तीनों मेसेज हम देश भर में भेजना चाहते हैं|

प्रश्न: सर मेरा रेलवेज के regarding सवाल है, hilly areas में जैसे आपने कहा कि यहाँ पर बहुत दिक्कतें आती है कई चीज़ों की, तो यहाँ पर road construction से एक और चीज़ में प्रॉब्लम आती है जैसे hills cutting होती है तो बाद में landslide वह सब बहुत दिक्कत वाला काम होता है और जो आगे जाकर ecology को बहुत खराब करता है| तो मेरा आपसे निवेदन है कि जैसे railways या इस तरह के विस्तार पर ही सरकार ध्यान दे या आपके flyovers और उसके लिए, मतलब सिर्फ जो हमारा development infrastructure है उसमें सिर्फ roads का ही एक प्रोत्साहन hilly areas में हिमाचल में न हो लेकिन और चीज़ों का प्रोत्साहन हो जैसे railways, monorails, या ऐसा कुछ हो?

उत्तर: बहुत अच्छा सुझाव है, क्या नाम है आपका?

प्रश्न: गगन|

उत्तर: Thank you Gagan, बहुत अच्छा सुझाव है, of course, रेलवे के लिए भी जगह तो लेनी पड़ती है, construction होता है, stations होता है इतना सरल नहीं है और दूसरा रेलवे पहाड़ों में गाँव-गाँव तक तो नहीं पहुँच पायेगा तो सड़क का निर्माण तो अनिवार्य होगा, करना ही पड़ेगा| पर आपका सुझाव भी अच्छा है मैं उसपर काम भी कर रहा हूँ| सुरेश प्रभु जी ने भी बहुत खासतौर पर चिंता की थी हिमाचल की, आपको एक आंकड़ा देता हूँ आपकी जानकारी के लिए| 108 करोड़ रुपये प्रति वर्ष 2009 से 2014 के बीच रेलवेज के प्रोजेक्ट्स हिमाचल में लगते थे, इस वर्ष, और यह लगातार 4 साल हम बढ़ाते रहे हैं, चारों साल हमने बढ़ाते रहे हैं इसको| इस वर्ष 512 करोड़ रुपये का अनुमान है, हिमाचल में, नए प्रोजेक्ट्स 2017-18 में sanction हुए, एक नयी लाइन शायद ऊना-हमीरपुर की 3040 करोड़ की, इलेक्ट्रिफिकेशन के प्रोजेक्ट्स|

ऐसे आज के दिन हिमाचल में और लगभग यह सब प्रोजेक्ट अभी नयी सरकार ने इसको तेज़ गति दी है, 254 किलोमीटर की 4 नयी लाइनें, 10,200 करोड़ रुपये की लागत से हिमाचल में लगने जा रही है| यह कभी इतने सालों के इतिहास में इतने प्रोजेक्ट हिमाचल में नहीं लगे  हैं, और अगर आप जानना चाहें तो यह नंगल डैम-तलवारा, चंडीगढ़-बद्दी जो उद्योग जगत से जुडी हुई है, भानुपली-बेरी और ऊना-हमीरपुर, यह एग्रीकल्चर, किसानों से जुडी हुई| तो चारों यह प्रोजेक्ट्स को गति दी जा रही है, बहुत सारे और मेरे पास लम्बी लिस्ट है, सब नहीं गिनाऊंगा|

मेरी पत्नी स्वयं मुझे हर बार कहती रहती है कि 5 घंटे क्यों नहीं दिए टॉय ट्रेन, इसको थोड़ा जल्दी करो, तेज़ करो, ज्यादा बढाओ उसको, लोगों को आकर्षित करो उसमें| आज भी मैं तो फ्लाइट से आया लेकिन वह बार-बार कह रही थी मुझे कि तुम जा रहे हो तो ज़रा उसको भी देख लेना क्या करना है|

प्रश्न: नमस्कार| मैं आपसे सर्विस टैक्स, स्ट्रक्चर के बारे में बात करना चाहूँगा, एक टूर ऑपरेटर, ट्रेवल एजेंट, एयर ट्रेवल एजेंट, ट्रांसपोर्टर, इसके बारे में एक आपसे सवाल है कि जितने यह लोग हैं, जितने यह सर्विसेज देते हैं उन पे नो आईटीसी| जैसे हम कोई बैगेज टूर organise करते हैं हम पहले जो है जीएसटी देते हैं होटल बुकिंग के ऊपर 28%, उसके बाद फिर उसी कस्टमर को हम जो है खाना खिलाते हैं उसके ऊपर हम जो टैक्स देते हैं 18% या 12%, फिर हम गाड़ी देते हैं, गाड़ी के ऊपर टैक्स देते हैं हम 5%, उसमें करके एंटरटेनमेंट के लिए कहीं ले जाया जाता है तो उसके ऊपर 28% टैक्स देते हैं, उसके बाद उसी कस्टमर से…..

उत्तर: मैं विशेष समझ गया, मतलब इतना टैक्स गिनाओगे तो… नहीं, ऐसा है कि टूरिज्म को प्रोत्साहन देना वास्तव में हम सबकी प्राथमिकता होनी चाहिए| बहुत बढ़िया सेक्टर है, इससे foreign exchange earnings, jobs, working opportunities, लोगों को छोटे-छोटे startups और नयी employment opportunities मिलती हैं| इसके बारे में मुझे लगता है एक holistic view थोड़ा बहुत लेना पड़ेगा, लेकिन आपने जितने यह टैक्स गिनाये ये सबका set off भी मिलता है साथ-साथ में जब आप आगे काम करते हो, गाड़ी का छोडकर शायद, गाड़ी पर नहीं मिलता होगा|

प्रश्न: (inaudible)… 5% टैक्स हम जीएसटी पे कर रहे हैं, टोटल टैक्स देने के बाद …… उसके बाद नो आईटीसी है?

उत्तर: हाँ तो वह नो आईटीसी इसलिए रखा है कि टैक्स रेट कम करने की डिमांड आई होगी| अगर आईटीसी रखना है तो फिर टैक्स रेट क्योंकि भाई साहब ने ठीक कहा न वैल्यू ऐड पर फिर टैक्स पे करना चाहिए| अब यह restaurant वाला भी यही हुआ, आईटीसी allow किया पर किसी ने पास ऑन नहीं किया, इसलिए अब जाना पड़ रहा है, उल्टा नो आईटीसी, लोअर रेट में| तो यह learnings हैं, इसके बारे में विस्तार से कभी एक बार, अब तो चुनाव के समय हम चेंज भी नहीं कर पाएंगे| एक बार टूरिज्म को लेकर हमारे टूरिज्म मंत्री नए हैं, बड़े उत्साहित हैं, अलफोंस जी, इनके साथ चाहिए तो हम आप लोगों को भी आमंत्रित करके या उनको मैं यहाँ भेज दूंगा, एक पूरी टूरिज्म इंडस्ट्री का विस्तार से सोचकर कुछ आगे का मार्ग बनाना चाहिए कि टैक्सेशन और डबल टैक्सेशन की मार आपके ऊपर न पड़े|

प्रश्न: (inaudible)

उत्तर: मैंने मान लिया है, पर मैं आपको बता रहा हूँ, इनपुट टैक्स देकर हम रेट बढाएं अगर तो प्रॉब्लम यह है कि लोग इनपुट टैक्स रख लेते हैं और आगे पास ऑन नहीं करते हैं|

प्रश्न: सर दूसरी बात यह है, कि जैसे अब No ITC है, चलो हमें कोई फरक नहीं पड़ता, हम तो कस्टमर से ले रहे हैं, पर जो हम advertisement, क्योंकि अपने बिज़नेस को प्रमोट करने के लिए हमें कुछ ऐसे काम करने पड़ते हैं, जैसे प्रमोशन करने के लिए हमें advertisement करनी पड़ती है| हर चीज़ बिज़नेस बढाने के लिए हमें बिल लेना पड़ता है, बिल के ऊपर हम जीएसटी दे रहे हैं, पर हम वह जीएसटी इनपुट में नहीं ले सकते सर?

उत्तर: मैंने अभी समझाया न वह तो choice है कि रेट बढ़ जाये फिर आप इनपुट टैक्स क्रेडिट लेकर हाई स्लैब में चले जायें|

प्रश्न: अश्वनी जी को मैं क्लियर कर देता हूँ, इनके पास दो ऑप्शन हैं, 12% के साथ वह जीएसटी का इनपुट ले सकते हैं या उनके पास दूसरा ऑप्शन है वह 5% के साथ जीएसटी का इनपुट नहीं ले सकते हैं, तो 5% वाले ऑप्शन में जायें, 12% में जायेंगे तो इनपुट ……

उत्तर: आपकी choice है, आप दोनों में से कोई एक ले सकते हैं|

प्रश्न: सर, इसके इलावा दो-तीन जैसे मैं इन्ही की मैं बात करूँ, तो जैसे जो goods हैं उसके अन्दर भी कम्पटीशन स्कीम है जैसे 50 लाख की हिमाचल, 75 हो गया शायद करोड़ का प्रपोजल एंड आल, आपकी मीटिंग में है| पर सर्विस सेक्टर के अन्दर सर कोई भी कम्पटीशन स्कीम नहीं है, except restaurants, कि जैसे यह छोटे लोग हैं, या even छोटे CAs हैं, tours and travels हैं, printing वाले हैं उनके लिए भी सर सर्विस सेक्टर की भी कोई कम्पटीशन स्कीम लानी चाहिए|

उत्तर: सर्विसेज में क्या है कि मिसयूज होने की संभावना बहुत बढ़ जाएगी, उदाहरण के लिए हम सब CAs बैठे हैं, अब अगर उसमें हम कम्पोजीशन स्कीम ले आते हैं तो सर्विस टैक्स का कोई मतलब ही नहीं रहेगा, हमारे तो family में 25 फैलें खुल जाएँगी, एक-एक करोड़ की|

प्रश्न: नहीं सर, प्रिंटिंग वाले, टूर्स एंड ट्रेवल्स हैं, बहुत छोटे-छोटे लोग हैं?

उत्तर: आप मेरे संकेत समझ गए होंगे|

प्रश्न: सर, एक तो कुछ एक लोग हैं जो यहाँ पर कोई रिप्रेजेंट नहीं कर सकता है उनके लिए मैं बात करना चाहूँगा जैसे जो depot holders हैं, जो उसके जो Public Distribution Service (PDS) के depot holders हैं उनकी commission को GST के अन्दर exempt किया गया है| इसी तरह एक बहुत बड़ी …… लेवल entrepreneurs के लिए ……………. उसमें बहुत सारे ……………. हैं… उनको जो commissions मिलते हैं सर वह GST के दायरे में है अभी, सर वह भी बहुत छोटे लोग हैं…………………..

उत्तर: बहुत टेक्निकल इशू है, इसका आप अगर लिखित मुझे भेज दो तो हम जीएसटी काउंसिल के समक्ष ज़रूर रखवा देंगे| थोड़े micro issues जो अभी तक जैसे चर्चा हुआ है they are useful, specific industry के कोई issue या कोई rate या कोई समस्या ऐसी वह आप लिखित दे दें तो क्योंकि ultimate decision तो मैंने जैसे कहा सामूहिक GST Council ही कर सकता है, मैं माध्यम बन सकता हूँ| पर macro thinking पर मुझे लगा थोड़ा आपको इसलिए अवगत कर दूं कि गलतफ़हमी नहीं हो कि यह रेट 5 लाख क्यों है, cess क्यों है Mercedes car के ऊपर, काजू और पैकेज्ड प्रोडक्ट के ऊपर अलग-अलग रेट क्यों है, उसके पीछे जो सोच थी या जो इतना complicated कभी-कभी लगता है शुरू में, बाद में तो यह बहुत सरल लगेगा जैसा भाई साहब ने ठीक कहा, एक बार हाथ बैठ जाये जैसे गाड़ी भी चलाने लगते हैं जब हम तो थोड़े दिन तो लगते है ना जब कठिनाई लगती है| एक बार हाथ बैठ जाता है तो पानी की तरह गाड़ी चलाते हैं| आखिर ट्रेनिंग का पीरियड तो छोटा-मोटा लगता ही है, तो यह वह पीरियड है, gestation period नए प्रोजेक्ट का|

प्रश्न: सर, ऐसा है कि आप रेलवे के मंत्री हैं, हिमाचल में आये हैं तो हिमाचल के लिए कोई ऐसी चीज़ जो आपको हमेशा याद रखेगी, रेलवे में हमें आजतक आज़ादी के बाद कुछ नहीं मिला है| जो रेल मंत्री आया उसने 36 ट्रेनें अपनी constituency में चला दीं, हिमाचल को आपने lollipop भी नहीं दिया| It is a very serious matter. हम आपको जन्म-जन्म तक याद करेंगे|

उत्तर: मेरा एक आपको, on a lighter note यह कह सकता हूँ कि शायद इसलिए मोदी जी ने राज्य सभा के सदस्य को रेल मंत्रालय दिया है क्योंकि मेरा कोई ऐसा constituency नहीं है या कोई ऐसा वह नहीं है कि मुझे महाराष्ट्र का ही काम करना है, but that is on a lighter note. On a more serious note, मुझे साढ़े तीन साल हुए power, coal, renewable देखते हुए, मैं आपसे यह अनुरोध करूँगा कि आप थोड़ा बहुत इन साढ़े तीन सालों का जो मैंने काम किया है उसका अगर research करें या मेरे website पर जायें या article निकालें कि ‘Maharashtra Coal block allotment, Piyush Goyal’ Google कर दें तो आपको ध्यान में आएगा कि साढ़े तीन वर्ष में कोई एक भी चीज़ ऐसी नहीं हुई है, और मैं सिर्फ मेरे मंत्रालय की नहीं कह रहा हूँ, पूरी मोदी सरकार की, जिसमें हमने कोई भी मंत्री ने प्रांतिकता या अपनी constituency को प्राथमिकता दी हो देश हित के सामने, जब कोयले के ब्लॉक्स आवंटन करने थे, 6 ब्लॉक्स, यहाँ पर महाराष्ट्र के पॉवर प्लांट है, यहाँ ब्लॉक्स हैं, बाजू-बाजू में| मतलब एक कन्वेयर बेल्ट से जा सकते हैं लेकिन वह 6 ब्लाक पहले कर्नाटक को दिए जा चुके थे, कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार थी|

मेरे सामने इतना प्रेशर था, CM का रोज़ फ़ोन, senior Ministers मेरे colleagues जो cabinet में हैं, MP-MLA वक्तव्य लिखे जाते थे, editorials थे हर पेपर में मेरी आलोचना करने में और हमारा वहां जो alliance partner है यह तो आप भी जानते हो कितनी आलोचना करता हैं| यह कहा गया कि हम चुनकर नहीं भेजेंगे वापिस राज्य सभा में पीयूष गोयल को हमारा इतना नुकसान कर दिया, इतने बाजू में माइन है और उठाकर यह माइन एक कर्नाटक को दी, लेकिन मैं महाराष्ट्र का विद्युत मंत्री नहीं था, देश का विद्युत मंत्री था| मैंने फिर भी वह कर्नाटक को दी, कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद वह 6 माइनें कर्नाटक को दी गयी, महाराष्ट्र को नुकसान थोड़ा हुआ उसका, गुस्सा आया लेकिन मुझे ध्यान था कि अगर वह कर्नाटक को नहीं जाती है तो महाराष्ट्र के लोगों को फायदा होगा, लेकिन कर्नाटक को उतने ही दूर से कोयला लाना पड़ेगा तो वहां नुकसान होगा यह कोयला आलरेडी कर्नाटक को serve कर रहा है|

तो बैलेंस और पैरिटी लायी गयी| और कोई एक काम कोई भी व्यक्ति निकालकर देख ले जिसमें हमने प्रांतिकता की हो, जिसमें हमने कहा हो गुजरात को ज्यादा फायदा हो जाये, हिमाचल या कोई और सरकार पश्चिम बंगाल को कम हो, कोई निकालकर दिखा दे| गुजरात की, महाराष्ट्र की बात करें तो जैसे मेरी 2 स्कीमें लॉन्च की थी दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना और Integrated Power Development Scheme, महाराष्ट्र-गुजरात के मंत्री, मुख्यमंत्री इतना नाराज़ रहे मुझसे क्योंकि उनको बहुत थोड़ी allotment मिली| ज्यादा अधिक मिली उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, झारखंड, इन इलाकों को, क्यों? क्योंकि यह वंचित रहे हैं, विकास और प्रगति से दूर रहे हैं, महाराष्ट्र-गुजरात में विकास आलरेडी काफी आगे हुआ है, हमारी इच्छा थी कि यह वंचित राज्यों को उठाया जाये| तो इतनी मेरी आलोचना होती थी लेकिन ज्यादा पैसा.. और यह सब राज्य Opposition के पास थे, समाजवादी थी UP में, तभी हमारा गठबंधन नहीं था, लालू जी की सरकार थी बिहार में नितीश जी के साथ, ओडिशा में BJD, कोई ऐसी हमारी सरकार नहीं थी| तो हमारा काम equitable और fair काम करने का है, उसी श्रेणी में हिमाचल के साथ भी न्याय होगा|

प्रश्न: नमस्कार पीयूष जी, मैं एक छोटा ट्रेडर हूँ, जीएसटी का एक स्लोगन था – एक टैक्स, एक देश, एक रेट| पहले क्या होता था डिफरेंस होता था सारे स्टेट्स के अन्दर टैक्सेज के तो purchaser जो होता था वह पंजाब से लाता था कि 5% कम है लेकिन हम जो छोटे ट्रेडर हैं आज ऑनलाइन से बहुत परेशान है| वहां पर 30%, 40%, 50% लेस मिलता है तो छोटा ट्रेडर डिस्ट्रॉय हो रहा है, इसके लिए आप क्या कर रहे हैं सर?

उत्तर: ऐसा है कि ऑनलाइन वास्तव में ऐसी चीज़ है जो पूरे विश्व में एक परिवर्तन ला रही है, ऑनलाइन ट्रेड को समझो हम यहाँ पाबंदी भी ले आयें तो ऑनलाइन तो कोई हमारे कंट्रोल में नहीं है, कोई Hong Kong में बैठकर ऑफर करना शुरू कर सकता है| और यह तो एक प्लेटफार्म होता है, इस प्लेटफार्म को आप एक जगह रोको, और किधर शुरू हो जायेगा| तो यह एक प्रकार से मैं समझता हूँ विश्व स्तरीय बदलाव आ रहा है, ऐसे में उसके बावजूद पूरे विश्व में छोटे व्यापार, corner stores, MSMEs, और भी पनप रहे हैं क्योंकि यह ऑनलाइन आगे चलकर उन्ही का सामान या उन्ही के माध्यम से सामान सप्लाई कर पाता है| आखिर उनको भी तो chain चाहिए न, logistics chain चाहिए, supplier चाहिए, किसी से सामान खरीदना है, किसी को देना है, वह तो एक प्लेटफार्म है, ऑनलाइन कोई उत्पादन नहीं कर रहे हैं| और यह जो डिस्काउंट ज्यादा है यह तो यह विदेशी लोग पैसा फूक रहे हैं भारत में, जैसे ही उनका पैसा फूक जायेगा तो वह वापिस पहुँच जायेंगे, कोई चिंता मत करो, लोग फिर हमारे पास ही आयेंगे व्यापार करने|

प्रश्न: पीयूष जी एक यहाँ पर सवाल आ रहा है जो लोग बोलना चाह रहे हैं, जोकि सर हिमाचल की जनता, हिमाचल की जनता क्या यह लोग बोल रहे हैं कि एक यहाँ पर ……. यहाँ पर एक …. ऐसा लॉ है जिसके अन्दर कोई भी आदमी चाहे वह हिमाचल में 40 साल से रह रहा है, चाहे वह 60 साल से रह रहा है या फिर 100 साल से रह रहा है, अगर वह agriculturist नहीं है तो यहाँ पर वह परचेस नहीं कर सकता कोई भी प्रॉपर्टी, कोई भी लैंड या प्रॉपर्टी| तो क्या कोई ऐसा…..?

उत्तर: यह लोकल स्टेट का इशू है, मुझे इसकी जानकारी भी नहीं है तो मुझे…इसमें में कुछ| मैं इसके बारे में जब तब अध्ययन नहीं करूँ कुछ बोल दूं तो वह.. मेरा वकील जब तक मेरे साथ नहीं है मैं कुछ बोल दूं तो incriminate हो जाऊंगा|

But I hope यह interactive session ज्यादा अच्छा था नहीं तो मैं भी एक भाषण ठोककर चले जाते|

Ends.

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November 5, 2017 Speaking at a Press Conference in Shimla

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